क़ाफ़िर कौन होता है ? ( चिराग शर्मा )

एक  ग़ज़ल  हमें भी तो चले मालूम आख़िर कौन होता है । ख़ुदा से पूछ के आओ “ये क़ाफ़िर कौन होता है ?” इक आंसू कर गया हिजरत मेरी आँखों की चौखट से, जब इक बच्चे ने ये पूछा “मुहाजिर कौन होता है ?” कमानें डाल दीं जब चाँद ने ही रात के आगे, उजाले बांटने वाला दिया फिर कौन होता है किसी की शक्ल लेने लगती है दीवार की सीलन, भला तन्हाई से अच्छा…

"क़ाफ़िर कौन होता है ? ( चिराग शर्मा )"

कवि मयंक मिश्रा ” रायबरेली “

जो बीत गया है वो कभी आ नही सकता कोई वक़्त से पहले यहा कुछ पा नही सकता जीवन है एक अनमोल सफर देखकर चलना कुदरत का भजन कर कोई ठुकरा नही सकता कवि मयंक मिश्रा रायबरेली   मेरा दिल तोड़ने वाले तेरा दिल टूट जायेगा। सवेरा है तो मुस्कालो अँधेरा भी तो आयेगा समय अच्छा तो सब संग हैं मगर इतना न इतराओ । बुरा जब वक़्त होगा तो न कोई पास आएगा। कवि…

"कवि मयंक मिश्रा ” रायबरेली “"

गर तुम पढ़ लेती

बात बेबात ऐसे न सताओ उनको जख्म दो पर ऐसे न भुलाओ उनको ये जो आखों में रखे है मोती थोड़े ये अमानत है ऐसे न लुटाओ उनको बातो बातो मे ऐसे न बहलाओ उनको जरा सी बात है थोड़ा सा मनाओ उनको वो मान जाएगें ऐसी तो कोई बात नही ये तो अपने है ऐसे न रूलाओ उनको – आशुतोष पाण्डेय शब्द सा तुम बनी, अर्थ मै हो गया। आत्मा तुम बनी, देह मै…

"गर तुम पढ़ लेती"

“वो गज़ल और हम”- राहुल कुमार (लेखक)

आज आख़री दफ़ा तन्हा हुवे हैं हम, पहली दफ़ा ग़ालिब समझ मे आये। ……..राहुल कुमार लिए हस्ती अपनी जब गुमनाम से मिलते हैं, अब मेरे लोग भी मुझको तेरे नाम से मिलते है। मग़रूर हो तुम भी तो हमे भी कोई जल्दी नही, चलो तो फिर तुमसे कभी आराम से मिलते हैं। …….राहुल कुमार रफ़ीक सारे अपने दुनिया-दारी में लगे हैं, हम बेवक़्क़त अब भी शायरी में लगे हैं। आफ़ताब को पहली दफ़ा सक हुवा…

"“वो गज़ल और हम”- राहुल कुमार (लेखक)"

“तुम नहीं समझोगे” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)

—– “तुम नहीं समझोगे” —– महलों में रहने वालों तुम क्या समझोगे जज्बातों को क्या समझोगे रिश्ते नातों को क्या समझोगे दुखियारी के रूनदन को क्या समझोगे अन्तर मन की वेदना को क्या समझोगे गरीब की लाचारी को क्या समझोगे मध्यम श्रेणी की पीड़ा को क्या समझोगे दुनियादारी को, क्या समझोगे ममता के बन्धन को महलों में रहने वाले सोने की चमक से चमक रहे नींव की ईंट की पीड़ा तुम क्यों नहीं समझ रहे…

"“तुम नहीं समझोगे” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)"

“मैं तुम और हम” —कवि अंकित

मैं तुम और हम” मैं डूबा तेरी आँखों में ,आँखों में मेरे पानी है….. कुछ उलझी , कुछ उलझन सुलझी अपनी एक कहानी है…. तेरे होंठों पे नाम जो आया, थोड़ा सा मुस्कराया…. रिश्तों को जरा सँजोए रखो , मौत तो हमको आनी है….. मेरे सपने कुछ हैं टूटे , कुछ तुमसे हैं जुड़े हुए …. जीवन के कुछ पन्ने अब भी हैं, थोड़े से मुड़े हुए…. मैं तुझसे पूरा होता हूँ , तू मुझमें…

"“मैं तुम और हम” —कवि अंकित"

“जल का तांडव”- मनोगुरू

“जल का तांडव” सैलाब के सितम ने देखो , आशियानों को डुबाया है…. जी रहे परिवार कोे संग , जीते जी ही बहाया है….. आपदा का स्वरूप धर यूँ , जल ने तांडव दिखाया है…… अब कष्टरूपी बारिश में देखो, जीवन कैसे नहाया है….. तन,धन,जन,अन्न भी , जल की जलन ने जलाया है…. खुशनुमा था हाल सबका , उनको भूखा रुलाया है …. सैलाब के सितम ने देखो , अरमानों को ढहाया है , बैर…

"“जल का तांडव”- मनोगुरू"

“नव्या”- एक खत तुम्हारे नाम Part 2— मनोगुरू

हाँ… तो बात कहाँ तक पहुँची थी, अरे याद आया । जन्मदिन तुम्हारा हो या फिर मेरा मगर एक दूसरे को सबसे पहले बधाई देने की होड़ सी लगती थी और हर बार शायद तुम ही जीती उस फर्ज को । खैर याद है ना तुम्हें काफी जिद करती थी तुम मुझसे बस एक गाना सुनने को कि-“बस एक बार सुना दो ना” दो आjतक मैंने सुनाया ही नहीं पर अब कभी-कभी जब तन्हाई कचोटती…

"“नव्या”- एक खत तुम्हारे नाम Part 2— मनोगुरू"

“तेरा ना होना बेहतर है” – मनोगुरु

वो थी तब खुश था वो थी तब खुश था, जो अब नाखुश है…. .वो थी सब कुछ था, जो अब ना कुछ है…. .‘वो’ और ‘मैं’ तब “हम” थे , जो अब ना हम हैं… .वो थी गम कम थे , जो अब गम नम हैं…. वो साथ थी , तब दम था… जो बात भी , अब कम है.. .बेशक दूरियाँ हैं , औ गम हैं पर आज भी हम , “हम” हैं……

"“तेरा ना होना बेहतर है” – मनोगुरु"

“नव्या”- एक खत तुम्हारे नाम (manoguru)

यह खत जो मैं तुम्हारे साथ बीते उन यादगार पलों को दोहराते हुए लिख रहा हूँ , शायद तुम्हारी उन नजरों से ओझल ही रहे जिन्हें देखकर मैं कभी अनकही बातों को बड़ी आसानी से परख लेता था। खैर वो अलग बात है पर तुम्हें याद तो होगा ही कि मुझे तुम्हारे इर्द-गिर्द काफी चक्कर लगाने पड़े थे बस एक ‘हाँ’ सुनने थी ।और काफी कोशिशों के बाद मन मुताबिक जवाब मिला तो वो कहावत…

"“नव्या”- एक खत तुम्हारे नाम (manoguru)"