Manoguru

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“तुम नहीं समझोगे” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)

—– “तुम नहीं समझोगे” —– महलों में रहने वालों तुम क्या समझोगे जज्बातों को क्या समझोगे रिश्ते नातों को क्या समझोगे दुखियारी के रूनदन को क्या समझोगे अन्तर मन की वेदना को क्या समझोगे गरीब की लाचारी को क्या समझोगे मध्यम श्रेणी की पीड़ा को क्या समझोगे दुनियादारी को, क्या समझोगे ममता के बन्धन को महलों में रहने वाले सोने की चमक से चमक रहे नींव की ईंट की पीड़ा तुम क्यों नहीं समझ रहे…

"“तुम नहीं समझोगे” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)"