अंतर्विरोध कल और आज

अंतर्विरोध कल और आज – वीरू सिंह

भारतीय समाज और राजनीति के तमाम अंतर्विरोध इस तरह पहले कब सतह पर तैरते दिखे थे, याद नहीं आता. भारतीय समाज के अंतर्विरोध पहली दफा तब दिखे थे जब मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने का सरकारी फैसला लिया गया था. लेकिन मंडल की वज़ह से समाज दो-फाड़ नहीं हुआ था. मंडल के समर्थन या विरोध में जो आन्दोलन हुए, वे भी अधिकांशतः शहरों तक ही सीमित रहे. अपने तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद, गाँव तक मंडल की आग नहीं पहुँच पाई थी. राजनीति के स्तर पर भी राईट और लेफ़्ट के बीच विशाल खाली मैदान मौजूद था. जनता दोराहे पर नहीं खड़ी थी; उसे अनिवार्यतः यह तय नहीं करना था कि वह इधर जाये या उधर जाये. उसकी मर्ज़ी और मन के मुताबिक कई अन्य दूसरे रास्ते भी विद्यमान थे. यकीनन, तब राजनीति जूमला नहीं बनी थी और न ही जनता किसी छलावे का शिकार हुई थी. वह राज्य-सत्ता के समक्ष पहले कभी इतनी बेबस और लाचार भी नहीं दिखी थी. याद रहे, उसने इंदिरा गाँधी को भी धुल चटा दी थी.

लेकिन आज स्थिति अलग है. सनातन धर्म की आड़ में राष्ट्रवाद का जो उफान पैदा किया गया, उसमें अंतर्विरोधों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी गई. हमारी पहचान देशभक्त व देशद्रोही तक सिमट कर रह गई. यह अलग बात है कि हम अभी तक यह जान नहीं पाए कि हम किसी को किस आधार पर देशभक्त अथवा देशद्रोही मानें. हर अंतर और असहमति को विरोध माना जाने लगा. राष्ट्रवाद के समक्ष जीवन के सारे दूसरे सवालों को तिरोहित कर दिया गया. इतिहास और मिथक के घालमेल से अतीत का छद्म गौरव गान किया जा रहा है. जिन विचारों व सरोकारों को प्रतिगामी मान लिया गया था, वे फिर से विमर्श के केंद्र में आ गए है. हिन्दू जागरण अभियान जारी है. मजहबी और जातीय घृणा का सार्वजनिक इजहार करना हमारे राष्ट्रीय स्वाभाव व कर्त्तव्य का हिस्सा बन गया है. हम राष्ट्रवाद के बंधक बन गए हैं या बनाये जा रहे हैं. राष्ट्रवाद एक जहरीला प्रत्यय है जो राज्य सत्ता को निरंकुश और क्रूर होने का मौका प्रदान करता है. कमजोर जनता मज़बूत राष्ट्र के सपनों में खोई मदमस्त रहती है.

राष्ट्रवाद के विपरीत जीवन प्रत्यय नहीं होता. प्रत्यूत, वह हाड-मांस से बने जिंदा इंसानों की रगों में खून बनकर दौड़ता है. वह लम्बे समय तक जुमलों से संचालित नहीं हो सकता. जीवन अपनी शर्तें आप तय करता है. नागरिक के रूप में हमें गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार हासिल है और हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते. हमें लड़ना होगा जीवन के लिए, जीवन की गरिमा के लिए और जीवन की खुशहाली व हरियाली के लिए. हमें पता है कि जीत हमारी ही होगी क्योंकि जीवन हमारे साथ है, सत्य हमारे साथ है. हमारी लड़ाई सत्यम, शिवम् सुन्दरम के लिए है.

भारत की सतरंगी छटा पहले कभी ऐसे विदीर्ण नहीं हुई थी.
Writer – Veeru Singh

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